Thu Oct 21
Anubhuti of Brajesh Kumar

दिनांक 25-12-99 को जब दीक्षा देते समय गुरुजी मेरे त्रिनेत्र को छुए तो मुझे मेरा सिर, आँख तथा पूरा चेहरा बहुत ही भारी लगने लगा | इसके थोड़े ही सेकेंडो के पश्चात मुझे अपना त्रिनेत्र दिखाई पड़ा और उसके ऊपर भगवान शंकर तथा गुरुजी एक ही रूप में दिखे जिसमे आधा शरीर भगवान शंकर का था और आधा गुरुजी का |

दिनांक 26-12-99 को मै सुबह 5 बजकर 5 मिनट में साधना में बैठा | परंतु मुझे आज कुछ बिशेष अनुभूति नही हुई | केवल मुझे अपने अपने त्रिनेत्र पर भगवान शंकर दिखाई दिये और इसके थोड़े ही समय के पश्चात मुझे अनुभूति हुई कि

गुरुजी गुरुमाता के असिम कृपा से मै साधना में 1 घंटा 50 मिनट (5 बजकर 5 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक) बैठा |

दिनांक 27-12-99 को मै सबेरे 3 बजकर 30 मिनट में साधना में बैठा | आज मुझे कल के अपेक्शा बहुत ज्यादा अनुभूति हुई | साधना में मुझे अचानक अपना त्रिनेत्र दिखाई देने लगा | वह्ना पर भगवान श्री शंकर विराजमान थे और उनके बगल में त्रिशुल भी था | उनको देखते ही मेरा सिर भारी हो गया और गुरुजी एवं गुरुमाता से अनुरोध करने लगा कि कृपया भगवान शंकर को मेरे त्रिनेत्र पर से हटाए | ऐसा कहने के थोड़े ही देर बाद भगवान शंकर को तांडव करते देखने लगा | तांडव करते समय त्रिशुल कभी उनके हाथों में तो कभी बगल में रहता था | भगवान श्रीकृष्ण भी वह्नी बगल में बैठे बांसुरी बजा रहे थे | फिर मेने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण हाथों में बांसुरी लिए हुए शिवलिंग पैर देकर खड़े हैं | इसके बाद मैंने भगवान श्रीकृष्ण के हृदय में गुरूजी एवं गुरमाता को देखा | मुझे बहुत ही आश्चर्य लग रहा था | गुरूजी एवं गुरुमाता की असीम कृपा से आज मेरी साधना २ घंटा १० मिनट (३ बजकर ३० मिनट से ५ बजकर ४० मिनट तक ) हुई |

दिनांक 28-12-99 को मै सुबह 4 बजकर 55 मिनट में साधना में बैठा | आज मुझे पिछले सरे दिनों की अपेक्षा अधिक अनुभूति हुई | आज मुझे अपनी नाभि में कमल के फूल पर पुनः भगवान श्रीकृष्ण हाथ में बांसुरी लिए हुए खड़े दिखाई दिए | भगवान श्रीकृष्ण के एक तरफ गुरूजी तथा दूसरे तरफ गुरुमाता खड़ी थी | मेरे प्रत्येक स्वास के साथ कमल के फूल पर बिराजमान भगवान श्रीकृष्ण, गुरूजी एवं गुरुमाता फूल सहित ऊपर नीचे आते - जाते दीखते थे | फिर अचानक मेरा ध्यान अपने त्रिनेत्र पर चला गया जाहाँ मै भगवान शंकर को साधना मे बैठे देखा था | उनके आगे उनका त्रिशूल भी खड़ा दिखाई देता था | पुनः जब मैने अपनी स्वाश तथा त्रिनेत्र पर से ध्यान हटा लिया तो मुझे गुरूजी एवं गुरुमाता दिखाई दिए | वे मुझे साथ लेकर आकाश मे उड़ने लगे और थोड़े ही देर बाद हम सब पृथ्वी से बाहर निकल गए | पृथ्वी से बाहर निकलते ही वहां हम सभी को नारद मुनि मिले | उन्होंने गुरूजी एवं गुरुमाता से पूछा कि अरे ये कौन हैं तथा इसे कहाँ ले जा रहे हैं | इस पर गुरूजी बोले कि यह नया साधक है और इसे हम लोग सभी भगवान के पास आशीर्वाद दिलाने जा रहे हैं |
इसके बाद हमलोग जल के अन्दर चले गए | वहाँ मैने देखा कि भगवान बिष्णु शेषनाग पर सोए हुए है उनके बगल मे माँ लक्ष्मी भी है | मुझे देखते ही भगवान बिष्णु गुरूजी एवं गुरुमाता से पूछने लगे ये कौन है | इस पर गुरूजी बोले कि ये नया साधक है | इसके बाद भगवान बिष्णु मुझसे बोले कि अरे बेटा इन्ही कि कृपा से तुम आज यहाँ तक आ पाए हो, इन्हें कभी भी नहीं छोड़ना | इन्हें छोड़ने का अर्थ है कि तुमने मुझे छोड़ दिया | इसके बाद भगवान बिष्णु को प्रणाम कर हम लोग वहां से चल दिए | पुनः भगवान शंकर तथा श्री गणेशजी पहले से ही बैठे हुए थे | वहां भी मेरा परिचय कराने के बाद माँ पार्वती, भगवान शंकर तथा श्री गणेशजी ने मुझे आशीर्वाद दिया | मुझे लगने लगा कि मेरे शरीर मे कोई पीला प्रकाश समां रहा है |

इसके बाद हमलोग कब पृथ्वी पर लौटे मुझे कुछ मालूम नहीं हुआ | पुनः मैने देखा कि भगवान शंकर तांडव कर रहे हैं और बगल मे भगवान श्री कृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं | तांडव करने के क्रम मे त्रिशूल कभी भगवान शंकर के हाथ मे रहता था तो कभी बगल मे | इसके बाद मैने देखा कि गुरूजी, माताजी तथा मै कहीं बैठे हुए है तभी अचानक माँ सरस्वती हंस पर बैठे आई और मुझे आशीर्वाद देकर चली गई | तभी गुरूजी एवं गुरुमाता ने भी मुझे आशीर्वाद दिया और बोले तुम अपने जीवन मे बहुत आगे बढ़ोगे और तुम्हारे ऊपर हमेशा हमारी कृपा बनी रहेगी | पुनः मैने देखा गुरूजी एवं माताजी मुझे लेकर किसी जगह पर गए जहाँ रामकृष्ण एवं विवेकान्द पहले से ही बैठे हुए थे | गुरूजी तथा माताजी ने उनसे मुझे आशीर्वाद देने के लिए कहा तो उन्होंने भी मुझे आशीर्वाद दिया | पुनः लौटते समय मैने प्रभु यीशु मशीह को देखा | उन्होंने भी मुझे आशीर्वाद दिया | प्रभु यीशु के बाद मैने मदर टेरेशा को देखा | माँ मदर टेरेशा ने भी मुझे आशीर्वाद दिया |
जब मै साधना मे बैठा तो साधना शुरू करने के करीब 15 मिनट के अन्दर ही मेरे पैर मे बहुत दर्द होने लगा और मुझे लगने लगा कि मेरा ध्यान टूट जायेगा | ऐसा होते ही मै गुरूजी एवं गुरुमाता को याद करने लगा और कहने लगा कि हे माँ बचाइए, मुझे पैर मे बहुत दर्द हो रहा है और लग रहा है कि मेरा ध्यान टूट जएगा | मेरे इतना कहते ही मै गुरूजी एवं गुरुमाता को अपने सामने देखने लगा | इसके बाद गुरुमाता हंसती हुई बोली अरे साधना पर से क्यों उठ रहे हो, रुको मै तुम्हे उर्जा देती हूँ | गुरुमाता के इतना कहने के बाद मैने देखा कि उनके हाथ मे पीला रंग का प्रकाश निकलकर मेरे पैर मे प्रवेश कर गया | इसके थोरे ही देर बाद मेरा पैर दर्द बिलकुल समाप्त हो गया | परन्तु इसके बाबजूद भी साधना मे दो - तीन बार पैर मे बहुत दर्द हुआ और दोनों - तीनो बार माताजी के उर्जा देने के पश्चात मेरा पैर दर्द बिलकुल ठीक हो गया |

आज शाम गुरुधाम मे मै लगभग 7 बजे साधना मे बैठ गया | साधना मे बैठने के 5 मिनट के अन्दर ही मुझे लगा कि मुझे किसी ने पीछे कि ओर धकेल दिया है और मै पीछे गिर पड़ा | यहाँ भी साधना मे मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा था | मैने पुनः गुरूजी एवं गुरुमाता को याद किया | अचानक गुरुमाता मेरी आँख के सामने प्रकट हो गईं और मेरे पैर मे उर्जा देकर पुनः गायब हो गईं | धीरे - धीरे मेरा शरीर बहुत हल्का हो गया | मुझे बहुत आनंद महसूस हो रहा था | मुझे लग रहा था कि मै शरीर से निकलना चाह रहा हूँ परन्तु निकल नहीं पा रहा हूँ | तभी गुरूजी आये जैसे ही उन्होंने मेरे चेहरा के सामने अपना हाथ घुमाया तो मुझे लगने लगा कि मेरे चेहरा के ऊपर कोई उजला प्रकाश छू रहा है | इसके बाद मेरे शरीर मै जैसे बहुत ही शक्ति आ गई और गुरूजी के कहने पैर मै उठकर बैठ गया | मै अपना आसन तो तोड़ चुका था, परन्तु मुद्रा अभी भी लगी हुई थी और गुरूजी के सामने बैठते ही अचानक पुनः मै साधना मै चला गया और पीछे कि ओर गिर पड़ा | पुनः गुरूजी के कहने पर मै गुरूजी के सामने से उठकर दूसरे जगह बैठ गया | दूसरी जगह जाने के बाद भी मुझे बेचैनी लग रही थी | परन्तु धीरे - धीरे यह बेचैनी दूर हो गई |

गुरुदेव एवं माताजी कि असीम कृपा से दीक्षा लेने के करीब दस दिनों के अन्दर ही मेरी ब्रह्म - मुहर्त कि साधना प्रतिदिन एक आसन मे करीब ५ घंटे होती है | गुरुदेव एवं माताजी को हर पल मै अपने साथ महसूस करता हूँ | उनकी कृपा सदा मुझ पर बनी रहे |

-ब्रजेश कुमार
द्वारा श्री विवेकान्द मिश्र
महेन्द्रू पटना

 


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