Thu Oct 21
Anubhuti of Kiran Ravindra Prasad
माताजी! आपकी कृपा एवं आशीर्वाद से यहाँ "गुरुधाम" का सब समाचार ठीक है | भजन का कार्यक्रम भी बहुत बढ़िया चल रहा है | माँ क्या लिखूँ , कैसे लिखूँ कुछ समझ में नही आ रहा है, कुछ अनुभूति लिख रही हूँ जो आपके अभी दिल्ली जाने पर हुई हैं | गलतियों के लिए क्षमा मांगती हूँ |

माताजी मेरे मन में आरती उतारने को लेकर तरह - तरह की बात आ रही थी, पता नही अब माताजी स्वीकार करेंगी या...|

मेरे मन में प्रतिपल यही प्रश्‍न बार - बार आ रहा था | उसी दिन शाम की 7.45 वाली साधना में देखती हूँ गुरुजी माताजी आसन पर (पूजा रूम में) विराजमान है | आरती कि थाली दूसरे के हाथ में थी, माताजी इशारा से बोली तुम उतारो, मै समझ नही पाई | गुरुजी मुस्कराते हुए प्यार से बोले मूर्ख है, गुरुजी कि बाणी सुनकर मेरे खुशी का ठिकाना नही रही | मै ज्यों ही थाली अपने हाथ में ली "गुरुजी माताजी" ध्यान मुद्रा में हो गये | मैंने पुरावा कि भाँति प्रेम से आरती उतारी यानि जो प्रश्‍न मेरे मन में था उसका जबाब मिल गया, सक्षात दर्शन भी हुए गुरुजी माताजी का |

"माँ" 11 जून 2002 को मेरी तबीयत खराब थी | रात्रि में और बढ़ गई | सर्दी, खाँसी, बुखार | सुबह किसी तरह 7 बजे उठी | रश्मि बेटी को जगाई दादाजी के लिए नासटा बनाना है, मै बाहर हॉल में ही सोफा पर लाइट गई | काफी बेचैनी एवं कमजोरी महसूस हो रहा था | सब कि बातें सुन रही थी, न मेरी आँख खुल रही थी न बोली निकल पा रही थी | 8 बजे के आसपास पीछे से मेरे ललाट पर कोई अपना हाथ रखें, मै सोचि कि पिताजी रखे होंगे | पिताजी नास्ता करके बेसिन पर हाथ धो रहे थे, रश्मि से पूछ रहे थे कि मम्मी को ज्यादा कशत है क्या ? तब मुझे झटका लगा कि ये हाथ मेरे सद्गगुरु देव जी रखे थे | मै उसी क्षण उठी, जाने कहाँ कि स्फूर्ति आ गई लगा जैसे कुछ हुआ ही नही है | जब मेरे पति रविंद्र जी साधना से उठाएँ तो, मै बोली अभी "गुरुजी" मेरे सिर पे हाथ रखे थे | उनके भी खुशी का ठिकाना न रहा, बोले जल्दी से गुरुजी - माताजी को चाय बनाकर पिलावो |

मेरे मन में जब - जब पत्रिका पढ़ती थी तब - तब आता था कि गुरुजी मुझे और रूप में क्यों नही दर्शन दिए, अभी तक केवल शिव रुप में देखी हूँ | मै अपने आप को कोस्ती थी, काश! मुझ पर भी गुरुजी कृपा करते | आख़िर कृपा सिंधु की कृपा आज 17-06-2002 की सुबह साधना में हुई | गुरुजी को कभी राम रुप में, कभी कृष्ण रुप में, तो कभी गुरुजी के रुप में देखती रही, क़रीब 5 मिनट तक ये अद्बभुत लीलाधारी की लीला देखती रही | इतना मनोरम द्र्श्य था कि मैं वर्णन नही कर सकती हूँ | मै तो खुशी से गदगद थी ऐसे लीलाधारी सद्गगुरु को मै पुनः बाराम्बार कोटि - कोटि प्रणाम करती हूँ |

माताजी शाम को गुरुधाम में भजन के समय साढ़े सात बजे के लगभग खुले नेत्र से देखती हूँ गुरुजी आसान पैर विराजमान हैं | काफी प्रसंन्नचित थे तथा बंशी बजा रहे थे | उस समय पति दीदी भजन गा रही थी - गोपाल तेरी पूजा हमसे न बनी रे चितचोर तेरी पूजा... अहा क्या कहूँ माताजी श्री गुरुजी के चेहरे में इतनी तैज़ चमक थी | इतना सुंदर चेहरा मैंने पहले कभी नही देखी थी | मेरी दृष्टि में अपनी दृष्टि डाल कर बात कर रहे थे - बढ़िया गा रही है, मुस्करा भी रहे थे, जैसे पहले किसी खास दिन भजन के समय आंखों के इशारे से बात कर रहे थे ठीक उसी प्रकार, मै तो वो दर्शन पा के धन्य - धन्य हो गई | मुझे तो नही लगता है कि हमारे गुरुजी समाधि ले लिए है | वही दिव्य्ता वही रौनक जब साधना से 8-15 में बाहर निकलती हूँ तब खल जाता है वो भी लगता है शारीरिक रुप से पटना से बाहर गए है | जिस दिन गुरुजी के पार्थिव शरीर का अंतिम यात्रा हम सभी क़रीब 5 हजार साधक भाई बहन कर रहे थे, रथ गुलाबी घाट महेंद्रु में रुकी | आगे रथ पीछे हम सभी "इस्स्योगी" थे | उस समय हमारे इस्स्योग के सचिव श्री के. एस. वर्मा जी जाएँ काली जय तारा गा रहे थे, हम सभी कोरस | ठीक उसी समय देखती हूँ "गुरुजी" रथ में खड़े थे जैसे चिलचिलाती दोपहर में आँख के पास हाथ रखे परेशान एवं आश्चर्य मुद्रा में निहार रहे थे | मानो कह रहे हों हमारे बच्चे को कितना कस्ट हो रहा है इस कड़ी धूप में | थोड़ी देर पश्चात देखती हूँ धूप आँख मिचौली खेलने लगी |

जिस समय गुरुजी के पार्थिव शरीर पाँच तत्व में विलीन हो रहा था | उस धधकती अग्नि के बीच में मैंने गुरुजी को साधना अवस्था में दर्शन पायी कह रहे थे हाड़ - मांश का शरीर जाल कर राख हो गया | देखो मै यहाँ उपस्थित हूँ | गुरुजी कि लीला समझ में न आए, जहां भी देखती हूँ, वहां उनका ही स्वरूप दिखता है | जब गुरुजी को हम सभी पहचान गये पूर्ण विश्वास के साथ, तब गुरुजी माताजी में समा गये | अब एक माला का राज़ समझ में आ गया |

किरण रवीन्द्र प्रसाद,
भजन सयोंजिका,
विशवा सदन, इंद्रा नगर, पटना
 
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